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बेशक वो प्यार था ...

  • Apr 23, 2020
  • 1 min read

बेशक वो प्यार था ... जो मैं लफ्ज़ो में बयां कर न सकी और वो बेज़ुबान आँखें पढ़ न सका

चेहरे की हर शिकन जो खिल उठती थी उसके होने से दिल की हर एक धड़कन जो डरती थी उसे खोने से माथे का ठंडा पसीना,उसकी बेरुखी से बिन बारिश खुद को आंसुओ से भिगोना साँसे चल रही थी पर उसके ना होने के ख्याल से भी अपने वजूद पे शक होना...

बेशक वो प्यार था ... जो मैं लफ्ज़ो में बयां कर न सकी और वो बेज़ुबान आँखें पढ़ न सका

समझाया बहुत था पर दिल कहाँ मानता है

वो तो ढूंड राहा था धड़कनो का बसेरा के जब वो कह दे रात , जब कह दे सवेरा उसने भी कुछ नहीं कहा, और दिल भी जानता था मेरा

बेशक वो प्यार था ... जो मैं लफ्ज़ो में बयां कर न सकी और वो बेज़ुबान आँखें पढ़ न सका

आज वो दूर अपनी दुनिआ अपने आकाश में उड़ रहा होगा उसकी अपनी दुनिआ वो अपने खुद के ख्वाब बुन रहा होगा किसी की तकदीर का सितारा , हाथों की लकीर बनने की ख्वाइश कर रहा होगा आज वो भी मेरी तरह किसी को खोने के ख्याल से डर रहा होगा

बेशक वो प्यार था ... जो मैं लफ्ज़ो में बयां कर न सकी और वो बेज़ुबान आँखें पढ़ न सका

 
 
 

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